फिर वो ही लाशों की गिनती वो खूं के छीटें
अब तो अख़बार को छूते हुए डर लगता है
बह गया खून तेरी आँख से आंसू न गिरा
हंसने वाले तेरा पत्थर का ज़िगर लगता है
भरी दुनियां में मुझे तुझ से ही शिकवें क्यूँ है
तू मेरा कुछ नहीं लगता है, मग़र लगता है
कल जो आबाद था एक शहरे निगाराँ की तरह
आज मैदान सा ता हद्दे नज़र लगता है
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