एक तेरी याद है फैले हुये जंगल की तरह
आज भी जिस में भटकता हूँ मै पागल की तरह
म्रेरे कमरे में बसी रहती है तेरीखुशबू
ख़त महकता है तेरा आज भी सन्दल की तरह
जब कभी भीगते मौसम का खयालआता है
उड़ के आ जाते हैं बादल तेरे आँचल की तरह
एक तरफ हम है के दो दिन नहीं काटे जाते
कंही सौ साल गुज़र जाते हैं एक पल की तरह
अपनी आँखों में बसालो हमें काजल की तरह
हम भटकते हैं तेरे शहर में पागल की तरह
बेजार देहलवी
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