हो गए पूरेजो अरमां वो तेरे अरमां थे
रह गये जितने अधूरे मेरे सपने होंगे
कौन था और मेरे दर्द को सुन ने वाला
मेरे गीतौं के खरीदार भी अपने होंगें
ग़ज़ल
उस बेवफा को हल सुना कर भी क्या लिया ?
उस ने हकीकतों का फसाना बना लिया
परियों की दास्ताँन सुना अपने साथ ही
कल रात मैंने बच्चों को भूखा सुला लिया
तोहफ़े मैं दे गए थे जो आंसू हमारे दोस्त
उन जुगनुओं को पलकों पे मैंने सजा लिया
पागल समझ के लोग कुछ पथराव कर गए
उन पत्थरों से मैंने घरौंदा बना लिया
जितने दीये थे सब मैं हमारा लहू जला
ये और बात जश्न तो तुम ने मना लिया
तहज़ीब तो पड़ी है अँधेरे मैं आज भी
इंसा ने आज चाँद पे जाके भी क्या लिया
बस ये कुसूर था की मुर ववत थी आँख मैं
कमजोरीयों का फायदा सब ने उठा लिया
बेजार एक शेर लिखा हमने खून से
इक बेतुके ने वो भी ग़ज़ल से चुरा लिया
बेजार देहलवी
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